Ind vs Eng: बल्‍लेबाज विराट कोहली तो चमके लेकिन कप्‍तानी में नहीं दिखी ऐसी चमक...

Updated: 12 September 2018 17:00 IST

कहा जा सकता है कि कप्‍तान के तौर पर उनके 'प्रदर्शन' में अभी सुधार की काफी गुंजाइश है. कप्‍तानी के पैमाने पर कोहली के प्रदर्शन को औसत ही माना जा सकता है. बल्लेबाज के रूप में कोहली इंग्लैंड के 2014 दौरे के बुरे सपने से शानदार तरीके से उबरने में सफल रहे लेकिन उनकी कप्तानी में अब भी परिपक्‍व होने की जरूरत है.

Virat Kohli the batsman wins, Virat the captain loses
सीरीज के दौरान डीआरएस लेने में भी विराट अपरिपक्‍व साबित नहीं हुए (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

इंग्‍लैंड के खिलाफ क्रिकेट सीरीज बल्‍लेबाज और कप्‍तान के रूप में विराट कोहली के लिए अलग-अलग परिणाम देने वाली साबित हुई. जहां बल्‍लेबाज के तौर पर विराट ने अपने प्रदर्शन से हर किसी को प्रभावित किया, वहीं कप्‍तान के रूप में वे अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरे नहीं उतर सके. कहा जा सकता है कि कप्‍तान के तौर पर उनके 'प्रदर्शन' में अभी सुधार की काफी गुंजाइश है. कप्‍तानी के पैमाने पर कोहली के प्रदर्शन को औसत ही माना जा सकता है. बल्लेबाज के रूप में कोहली इंग्लैंड के 2014 दौरे के बुरे सपने से शानदार तरीके से उबरने में सफल रहे लेकिन उनकी कप्तानी में अब भी परिपक्‍व होने की जरूरत है. विराट का यह आकलन सही है कि 1-4 की हार के दौरान लार्ड्स टेस्ट के अलावा बाकी टेस्ट में इंग्लैंड की टीम पूरी तरह से उन पर दबदबा नहीं बना पाई लेकिन मेजबान टीम ने अहम मौकों पर बेहतर क्रिकेट खेला.

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 इस सीरीज से साबित हुआ कि बल्‍लेबाज कोहली सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विश्व क्रिकेट में अपने समकक्षों से कहीं आगे हैं. कोहली ने सीरीज में दो शतक और दो अर्धशतक की मदद से 593 रन बनाए और इस दौरान प्रतिद्वंद्वी गेंदबाज जेम्स एंडरसन के साथ उनका संघर्ष लोगों के लिए दर्शनीय रहा. भारत के दूसरे सर्वोच्च स्कोर लोकेश राहुल रहे जिन्होंने 299 रन बनाए लेकिन इसमें से 149 रन उन्होंने महज औपचारिकता के अंतिम मुकाबले में बनाए जिसमें दबाव नहीं था. कोहली ने हालांकि यह परखने में गलती की कि उनके साथी खिलाड़ी इंग्लैंड के मुश्किल हालात के लिए उतने तैयार नहीं हैं जितने वह स्वयं हैं. भारत ने काउंटी चैंपियन एसेक्स के खिलाफ एकमात्र अभ्यास मैच के समय को भी कम कर दिया जिसकी सुनील गावस्कर जैसे महान खिलाड़ी ने भी आलोचना की. भारत के लिए हालांकि सबसे बड़ी समस्या टीम के चयन में कुछ खामियां साबित हुईं. ट्रेंटब्रिज टेस्ट में भारत की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले चेतेश्वर पुजारा ने एक शतक भी जड़ा लेकिन इससे पहले उन्हें काउंटी क्रिकेट में खराब फॉर्म में कारण पहले टेस्ट से बाहर कर दिया गया. इस टेस्ट विशेषज्ञ बल्लेबाज ने सीरीज में 278 रन बनाए.

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टेस्ट क्रिकेट में हार्दिक पंड्या की आलराउंड क्षमता में कोहली के अति विश्वास पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं. उन्होंने 164 रन बनाए जिसमें ट्रेंटब्रिज में अर्धशतकीय पारी उन्‍होंने उस समय खेली जब भारत पारी घोषित करने की ओर बढ़ रहा था. इसके अलावा चार टेस्ट में वह बल्ले से प्रभावी प्रदर्शन करने में नाकाम रहे. पंड्या के पास छठे नंबर पर बल्लेबाजी करने का रक्षात्मक कौशल नहीं है और स्विंग लेती गेंदों के खिलाफ उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. दूसरी तरफ इंग्लैंड टीम के उनके समकक्ष सैम कुरेन का प्रदर्शन मेजबान टीम के लिए निर्णायक साबित हुआ और उन्होंने एजबेस्टन में पहले टेस्ट और साउथम्पटन में चौथे टेस्ट में अपने आलराउंड प्रदर्शन से टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई. कप्तान ने शिखर धवन को सलामी बल्लेबाज के रूप में लगातार मौके दिए और वह विफल होते रहे. कई बार तो यह भी आरोप लगा कि विराट के करीबी होने के कारण ही धवन को नाकामी के बावजूद इतने मौके मिले.

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दक्षिण अफ्रीका के 2013 दौरे से ही धवन को टेस्ट खेलने वाले शीर्ष देशों के खिलाफ जूझना पड़ा है. आठ पारियों में वह सिर्फ 162 रन बना पाए जो संभवत: उनके टेस्ट करियर को नुकसान पहुंचा सकता है क्योंकि पृथ्वी शॉ और मयंक अग्रवाल मौके के इंतजार में तैयार बैठे हैं. कोहली दुर्भाग्यशाली रहे कि उन्होंने पांचों टेस्ट में टॉस गंवाए लेकिन पिच को पढ़ने की उनकी क्षमता और टीम संयोजन को लेकर काफी सुधार की गुंजाइश है. एजबेस्टन में दूसरा स्पिनर नहीं चुनना गलती थी जबकि पिच से टर्न और उछाल मिल रहा था. परेशानी उस समय बढ़ गई जब लार्ड्स में दो स्पिनरों के साथ उतरा गया जबकि हालात तेज गेंदबाजी के अनुकूल थे. भारत संभवत: तेज गेंदबाजों के अपने सर्वश्रेष्ठ समूह के साथ उतरा जिन्होंने हालात का फायदा उठाया लेकिन वे कई मौकों पर इंग्लैंड के निचले क्रम को समेटने में नाकाम रहे जिसने जज्बा दिखाया. ईशांत शर्मा 18 विकेट के साथ भारत के सबसे सफल गेंदबाज रहे जबकि जसप्रीत बुमराह ने 16 और मोहम्मद शमी ने 14 विकेट चटकाए. रविचंद्रन अश्विन साउथम्पटन में अपने लिए सबसे अनुकूल पिच पर भी कोई कारनामा नहीं कर पाए जो पिच संभवत: रवींद्र जडेजा जैसे खिलाड़ी के लिए आदर्श होती.

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करुण नायर पूरे दौरे के दौरान बेंच पर ही बैठे रह गए जबकि हनुमा विहारी को अंतिम टेस्ट की अंतिम एकादश में मौका मिला गया. विहारी ने 56 रन बनाए लेकिन अगर स्टुअर्ट ब्रॉड पहली पारी में एलबीडब्‍ल्‍यू की अपील के लिए डीआरएस का सहारा लेते तो यह बल्लेबाज दोनों पारियों में शून्य पर आउट होता. भारत के लिए अच्छी बात अंतिम टेस्ट की चौथी पारी में लक्ष्य का पीछा करते हुए राहुल और ऋषभ पंत के शतक रहे. इसके बावजूद विकेटकीपर के तौर पर पंत के प्रदर्शन में काफी सुधार की जरूरत है. उन्‍होंने सीरीज के दौरान तीन मैच खेले और बाय के रूप में काफी रन विपक्षी टीम को तोहफे में दिए.(इनपुट: भाषा)

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हाईलाइट्स
  • हार्दिक पंड्या की ऑलराउंड क्षमता पर किया अति विश्‍वास
  • धवन को खेलने के इतने मौके मिलने पर हर कोई है हैरान
  • डीआरएस लेने में भी विराट का 'प्रदर्शन' अच्‍छा नहीं रहा
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